Saturday, December 17, 2016

यथार्थ से ‘ब्रेकअप’ करता हिंदी सिनेमा

हरिनाथ कुमार 

हिंदी सिनेमा ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है जहां ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ हो रहा है वहीं समाज के तानेबाने और रिश्तों को तोड़मरोड़ कर फिल्माया जा रहा है। यही नहीं, हाल की फिल्मों में समाज के रिश्तों की डोर की ताकत और मियाद को इस तरह फिल्माया गया है जो यथार्थ में खलबली मचाता है। इन फिल्मों को दस्तावेज माने तो गम में उत्सव मनया जा रहा है। ब्रेकअप हो या तलाक, वह भी जश्न मनाने का जरिया हो गया है, जैसा कि आजकल की फिल्में हमें परोस रही हैं। 
ब्रेक अप रोमांच 

हाल ही में आई फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल का चौथा गाना ब्रेकअप सॉंग है। इस गाने को अनुष्का शर्मा और रणबीर कपूर पर फिल्माया गया है। इस गाने को अरिजित सिंह ने गाया है और बादशाह का रैप भी है। इस गाने में रणबीर अपने ब्रेकअप का जश्न नजर आते हैं। यूं तो ब्रेकअप सांग दर्द भरे ही होते हैं। ब्रेकअप के बारे में हर किसी के अपने विचार होते हैं। अमूमन लोग इस मौके पर काफी दुखी होने के साथ ही रोते भी हैं। अगर आप भी ऐसा ही करते हैं तो करण जौहर इस ट्रेंड को बदलने के लिए ही ब्रेकअप गाने को लेकर हाजिर हैं। मतलब कि करण जौहर निर्देषि त ‘ऐ दिल है मुष्किल’ का ब्रेकअप सॉंग टूटे दिल और दुखी लबों को हंसने पर जरूर मजबूर कर देता है।
वैसे तो यह पहला गाना नहीं है जो गमों पर मरहम लगाने का काम करता है। हिंदी सिनेमा में ऐसे गानों की एक लंबी फेहरिस्त है।
फिल्म ‘लव आजकल’ में ब्रेकअपन की पार्टी को जय और मीरा भी सेलिब्रेट करते हैं। इसके बाद इसी फिल्म का गाना ‘चोर बाजारी दो नैनों की’ भी उनकी ब्रेकअप मस्ती पर फिल्माया गया है। ऐसे ही हनी सिंह ने एक ब्रेकअप सांॅग बनाया जिसमें वह ब्रेकअप का जष्न मनाते नजर आते हैं। गाने की बोल है-आज मैंने ब्रेकअप की पार्टी रख ली है। फिल्म ‘देव डी’ का गाना ‘इमोषनल अत्याचार’ भी बेहतरीन ब्रेकअप सांॅग है। 
मनोरंजन के नाम पर इतिहास के साथ कितनी तोड़मरोड़ की जा सकती है, इसका समाज के ऊपर कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है, इन सवालों की पड़ताल करने की अब जरूरत आन पड़ी है। 
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (जिसे व्यंग्य में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है) जितनी मशक्कत राजनीतिक फिल्मों में कट लगाने के लिए करता है, उसका कुछ फीसद भी अगर ऐतिहासिक तथ्यों और सामाजिक बनावट के साथ होने वाली छेड़छाड़ को रोकने के लिए करता तो आज हमारा समाज अपने इतिहास के प्रति थोड़ा बहुत जागरूक अवश्य हो गया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भारतीय इतिहास के तमाम तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर उसे विकृत किया जाता रहा है। ‘जनसत्ता’ में प्रकाषित अपने लेख में सुधांषु गुप्ता लिखते हैं कि वर्ष 1960 में के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ बनाई। सलीम (जहांगीर) और अनारकली के प्रेम संबंधों पर बनी इस फिल्म ने सफलता का सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। हकीकत में इतिहास में अनारकली नाम की कोई महिला थी ही नहीं। यह निर्माता-निर्देशक की कोरी कल्पना थी। और इस कल्पना का लिए जमीन तैयार की थी उनका द्वारा देखे गए एक नाटक ने। फिल्म में इतिहास के साथ खासी छेड़छाड़ की गई, उसे तोड़ा मरोड़ा गया था। मगर फिल्म हिट साबित हुई। इस फिल्म की सफलता ने फिल्म निमार्ताओं के लिए इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए जैसे सारे दरवाजे ही खोल दिए। तब से यह सिलसिला बराबर चल रहा है।
सवाल वही उठता है कि आखिर क्यों फिल्मकार और निर्माता हमारे इतिहास और सामाजिक संबंधों के साथ इतनी आजादी ले पाते हैं कि वे उसे जैसा और जहां चाहें मोड़ सकते हैं? क्यों हमारा समाज इसका विरोध नहीं करता? दरअसल, यह संवेदनहीनता पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में लिए है। न तो फिल्में बनाने वालों को इससे कोई फर्क पड़ता है और न ही इसे देखने वालों को। हमारा समाज भी इस तरह की चीजों पर किसी तरह का विरोध प्रकट नहीं करता।

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