मतलब

शब्द के मायने कभी स्थिर नहीं होते मसलन प्रसंग बदलता है मायने बदलते हैं.

Monday, September 1, 2014

Poem

Posted by हरिनाथ कुमार at 5:05 AM No comments:
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हरिनाथ कुमार
मोदी वाले क्योटो से परास्नातक हथियाने के बाद रोजी रोटी की जुगाड़ में दिल्ली में डेरा और अब लखनऊ। फाडू पत्रकार बनने की ख्वाहिश धूमिल हुई तो बोकराधी का शौक परवान पर। सार्वजनिक लूज टॉक में महारथ हाशिल। किसी भी खबर में अपनी चिप्पी चपकाने में चेपक हूं। दलित, आरक्षण और महिला को लेकर कोई हलकी बात कहे तो मौकवारदात पर ही ठोकने में माहिर हूं। दाल-भात भकोसता हूं। हिंदी ‘सलीमा’ देखता हूं और इसके लिजलिजे नुमाइस पर पिंगल छोड़ता हूं। रैजन्नी में भसमेड़ मचाता हूं। 'सरोकार' कैसा भी हो पसंद है....
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