Saturday, December 17, 2016

यथार्थ से ‘ब्रेकअप’ करता हिंदी सिनेमा

हरिनाथ कुमार 

हिंदी सिनेमा ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है जहां ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ हो रहा है वहीं समाज के तानेबाने और रिश्तों को तोड़मरोड़ कर फिल्माया जा रहा है। यही नहीं, हाल की फिल्मों में समाज के रिश्तों की डोर की ताकत और मियाद को इस तरह फिल्माया गया है जो यथार्थ में खलबली मचाता है। इन फिल्मों को दस्तावेज माने तो गम में उत्सव मनया जा रहा है। ब्रेकअप हो या तलाक, वह भी जश्न मनाने का जरिया हो गया है, जैसा कि आजकल की फिल्में हमें परोस रही हैं। 
ब्रेक अप रोमांच 

हाल ही में आई फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल का चौथा गाना ब्रेकअप सॉंग है। इस गाने को अनुष्का शर्मा और रणबीर कपूर पर फिल्माया गया है। इस गाने को अरिजित सिंह ने गाया है और बादशाह का रैप भी है। इस गाने में रणबीर अपने ब्रेकअप का जश्न नजर आते हैं। यूं तो ब्रेकअप सांग दर्द भरे ही होते हैं। ब्रेकअप के बारे में हर किसी के अपने विचार होते हैं। अमूमन लोग इस मौके पर काफी दुखी होने के साथ ही रोते भी हैं। अगर आप भी ऐसा ही करते हैं तो करण जौहर इस ट्रेंड को बदलने के लिए ही ब्रेकअप गाने को लेकर हाजिर हैं। मतलब कि करण जौहर निर्देषि त ‘ऐ दिल है मुष्किल’ का ब्रेकअप सॉंग टूटे दिल और दुखी लबों को हंसने पर जरूर मजबूर कर देता है।
वैसे तो यह पहला गाना नहीं है जो गमों पर मरहम लगाने का काम करता है। हिंदी सिनेमा में ऐसे गानों की एक लंबी फेहरिस्त है।
फिल्म ‘लव आजकल’ में ब्रेकअपन की पार्टी को जय और मीरा भी सेलिब्रेट करते हैं। इसके बाद इसी फिल्म का गाना ‘चोर बाजारी दो नैनों की’ भी उनकी ब्रेकअप मस्ती पर फिल्माया गया है। ऐसे ही हनी सिंह ने एक ब्रेकअप सांॅग बनाया जिसमें वह ब्रेकअप का जष्न मनाते नजर आते हैं। गाने की बोल है-आज मैंने ब्रेकअप की पार्टी रख ली है। फिल्म ‘देव डी’ का गाना ‘इमोषनल अत्याचार’ भी बेहतरीन ब्रेकअप सांॅग है। 
मनोरंजन के नाम पर इतिहास के साथ कितनी तोड़मरोड़ की जा सकती है, इसका समाज के ऊपर कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है, इन सवालों की पड़ताल करने की अब जरूरत आन पड़ी है। 
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (जिसे व्यंग्य में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है) जितनी मशक्कत राजनीतिक फिल्मों में कट लगाने के लिए करता है, उसका कुछ फीसद भी अगर ऐतिहासिक तथ्यों और सामाजिक बनावट के साथ होने वाली छेड़छाड़ को रोकने के लिए करता तो आज हमारा समाज अपने इतिहास के प्रति थोड़ा बहुत जागरूक अवश्य हो गया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भारतीय इतिहास के तमाम तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर उसे विकृत किया जाता रहा है। ‘जनसत्ता’ में प्रकाषित अपने लेख में सुधांषु गुप्ता लिखते हैं कि वर्ष 1960 में के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ बनाई। सलीम (जहांगीर) और अनारकली के प्रेम संबंधों पर बनी इस फिल्म ने सफलता का सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। हकीकत में इतिहास में अनारकली नाम की कोई महिला थी ही नहीं। यह निर्माता-निर्देशक की कोरी कल्पना थी। और इस कल्पना का लिए जमीन तैयार की थी उनका द्वारा देखे गए एक नाटक ने। फिल्म में इतिहास के साथ खासी छेड़छाड़ की गई, उसे तोड़ा मरोड़ा गया था। मगर फिल्म हिट साबित हुई। इस फिल्म की सफलता ने फिल्म निमार्ताओं के लिए इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए जैसे सारे दरवाजे ही खोल दिए। तब से यह सिलसिला बराबर चल रहा है।
सवाल वही उठता है कि आखिर क्यों फिल्मकार और निर्माता हमारे इतिहास और सामाजिक संबंधों के साथ इतनी आजादी ले पाते हैं कि वे उसे जैसा और जहां चाहें मोड़ सकते हैं? क्यों हमारा समाज इसका विरोध नहीं करता? दरअसल, यह संवेदनहीनता पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में लिए है। न तो फिल्में बनाने वालों को इससे कोई फर्क पड़ता है और न ही इसे देखने वालों को। हमारा समाज भी इस तरह की चीजों पर किसी तरह का विरोध प्रकट नहीं करता।

Tuesday, September 13, 2016

रेखा पर अंकित शब्दों के मायने


कितना मुश्किल है। जिसकी जिन्दगी के पन्नों पर आप लिखने जा रहे है, वह आपसे बात ही ना करे। और उसकी जिन्दगी के पन्नों को जिसने संवारा हो, उससे भी आपकी कोई बात ना हो। फिर भी आप लिखे जा रहे हैं। पहले से कहे-लिखे गये पन्नों को अपनी दृश्टि से नये पन्नो पर उकेर रहे हैं और पढ़ने वाले पढ़े जा रहे हैं। तो ये किताब की सफलता है या फिर उस शख्स की जिसने अपनी जिन्दगी की अहमियत को जब समझा, अपने वजूद का एहसास नये रूप में किया तो खुद को कुछ इस तरह ढक लिया कि आजभी उस शख्स को देखते ही बहुतेरी अनकही कहानियां दिलो– दिमाग में  ही जाती है । और उसके बारे में और जानने की चाहत चाहे अनचाहे उसके बारे में लिखे कुछ भी शब्दो में मायने खोजने को मजबूर करती है। जी, उस शख्स का नाम है रेखा। किताब का नाम है रेखा। भगवती चरण वर्मा का उपन्यास रेखा नहीं। बल्कि फिल्म अदाकारा रेखा पर लिखी गई यासिर उस्मान की पुस्तक रेखा। जिसने मना कर दिया कि उसपर लिखी जा रही किताब पर वह कुछ नहीं कहेंगी। जिसकी जिन्दगी में आये तीन शख्स। विनोद मेहरा । किरण कुमार । अमिताभ बच्चन। इनसे भी कोई बात इस किताब को लिखने के दौर में नहीं हुई। और जिस शख्स से विवाह फिर तलाक हुआ, उस शख्स मुकेश अग्रवाल के साथ बिताये बेहद कम दिनो के दौर को लिखते वक्त ही लेखक को हकीकत की जमीन मिली। कयोंकि किताब चाहे रेखा पर हो लेकिन मुकेश अग्रवाल से रेखा ने शादी क्यों कि और फिर शादी क्यों टूटी। उस दौर के किरदार जिन्दा भी हैं और दुनिया के सामने कभी आये भी नहीं ये भी सच हैं। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रहे नीरज कुमार। बीना रमानी और सुरेन्द्र कौर। तीनों की मौजूदगी । तीनो की रजामंदी । तीनो ने ही उस दौर को देखा ही नहीं बल्कि उन हालातो में बराबर का सहयोग दिया जिसके बाद मुकेश अग्रवाल और रेखा की शादी हुई । 

लेकिन रेखा की जिन्दगी वाकई अनकहे सच को टटोलने की दिशा में बढते कदमो से ज्यादा कुछ नहीं । तो हर शब्द सस्पेंस की घुट्टी में डुबोने का प्रयास होगा। इससे इंकार कौन कर सकता है । मसलन मुकेश अग्रवाल ने खुदकुशी उसी दुप्पटे को गले में बांध कर की जो रेखा का प्रिय दुपट्टा था । तो किताब मुकेश अग्रवाल की जिन्दगी से शुरु होती है । और मुकेश की जिन्दगी पर पडे रेखा के तिलिस्म को धीरे धीरे उठाती है। और रेखा के बारे में एक सोच बनाने को मजबूर करती है । जाहिर है रेखा से कोई बात नहीं तो रेखा को चाहने वाले यासर उस्मान के शब्दो पर भरोसा भी कितना करें । लेकिन स्टारडस्ट से लेकर सिमी ग्रेवाल को दिये इंटरव्यू । 70 के दशक में मीडिया के सामने रेखा के बेलौस बयान । और जया भादुडी से लेकर जया बच्चन बनने के दौर में रेखा की दीदीभाई यानी जया से दोस्ती से लेकर दूरिय़ॉ बनाने-बनने की नकही दास्तन को अपने नजरिये से जिस तरह लेखक ने पन्नों पर उकेरा वह किसी सिनेमायी स्क्रिप्ट से ज्यादा नही तो कम भी नहीं है । क्योंकि जब लेखक से कोई संवाद किसी का नहीं है तो पढने वाले को लेखक की समझ या उसके दिमाग में चल रहे ताने-बाने के भरोसे ही चलना होगा । लेकिन दिलचस्प है रेखा के उन अनझुये पहलुओ को जानना जिसे रेखा खुद कभी जुबां पर ला नहीं पायी । 

कौन जानता है कि जया और रेखा दोनों ही जुहु  अपार्टमेंट में रहते थे । कितनों को पता है कि जया को रेखा ने बहन मान कर बेहतीन सुझाव देने वाला माना। लेकिन अमिताभ बच्चन से शादी हुई तो जया ने रेखा को निमंत्रण तक नहीं दिया। कितनों को पता है कि रेखा का अमिताभ बच्चन को लेकर आकर्षण काम के प्रति अमिताभ की प्रतिबद्दता और अनुशासन को लेकर हुआ। फिल्म दो अनजाने की कलकत्ता में शूटिंग के वक्त ही अमिताभ ने अपने पुराने शहर को जीने निकले तो साथ संवाद बनाने के लिये सहयोगी अदाकारा रेखा ही थीं, जो कलकत्ता शहर से अनजान थी। तो संवाद बना । और कितनों को मालूम है कि अमिताभ-रेखा की सिनेमायी पर्दे पर कैमेस्ट्री से गुस्सायी जया ने रेखा के साथ अमिताभ का काम मुकद्दर का सिंदर के बाद बंद तो करवा दिया । लेकिन फिल्म सिलसिला में महज एक डॉयल़ॉग या कहें फिल्म के आखिरी सीन ने जया बच्चन सिलसिला में काम करने पर हामी भरवा दी। वह भी फिल्म की आखिरी सीन/डॉयलॉग, ‘ जया अस्पताल के बेड पर बेहोश लेटी है। डाक्टर-नर्स उसमें जान देने की कोशिश कर रहे है । तभी अमिताभ बच्चन ह़ॉस्पीटल पहुंचे है । कमरे से सभी को बाहर जाने के लिये कहते है और जया का ठंडा पड़ता हाथ अपनी हर्म हथेलियो में लेकर कहते है...शोभा मै वापस आ गया हूं..हमेशा के लिये ...और जया धीरे धीरे आंखे खोल कमजोर जुबां से कहती है ...मैं जानती थी..तुम वापस जरुर आओगे......और यहां प्यार पर विश्वास की जीत होती है । क्योंकि समूची फिल्म में जब रेखा और जया टकराते है तो संवाद रेखा के इसी डॉयलॉग पर आकर ठहरता है कि....आप अपने विश्वास के साथ रहिये, मुझे मेरे प्यार के साथ रहने दीजिये।   ‘ कितने धूप-छांव रेखा की जिन्दगी में कब कैसे टकराये इन हालातो को पढने वाला किताब के रेफरेन्स से जोड कर समझ सकता है क्योकि किताब खुद को रेखा होने से बचाती है । लेकिन रेखा को रेखा होने से नहीं बचा पाती। इसलिये जयपुर में महान की शूटिंग के वक्त रेखा को लेकर कमेंट करने पर एक फैन से ही अमिताभ का उलझना या फिर फिल्म कुली में अमिताभ के घायल होने के बाद पुनीत के ये कहने पर, .....जिसकी सजा तुम हो मैंने वह गुनाह किया है । इस पर रेखा का कमेट...और कितने गुनाह करेंगें आप । 

लेकिन रेखा को बचपन से ना किसी ने संवारा । न किसी ने बचपन जीने दिया । तो किसी पहाडी नदी की तरह रेखा जीवनदायनी नदी के तौर पर देखी भी नही गई । इसलिये जब अमिताभ कुली की शूंटिग से गायल अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे थे । तब रेखा ने अमिताभ के अमिताभ की मदद की सोच फिल्म उमराव-जान का प्रिमियर रखा । खुद ही सारे निमंत्रण पर हस्ताक्षर किये । लेकिन फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं लोगों ने भी इसे अमिताभ के हक में नहीं माना । और प्रीमियर “  डेड और स्टारलैस “  हो गया । यूं रेखा की
जिन्दगी के पन्नो को सिनेमायी डॉयलॉग में खोजने की कोशिश बेमानी है । लेकिन लेखक ने ये हिम्मत दिखायी है । मसलन....खून-पसीना कै डॉयलॉग...तेरा हुस्न मेरी ताकत,तेरी तेजी मेरी हिम्मत...इस संगम से जो औलाद पैदा होगी, वह औलाद नहीं फौलाद होगी । या फिर गीत....तु मेरा हो गया, मै तेरी हो गई....। विनोद मेहरा के साथ फिल्म घर । उसका गीत...आपकी आंखो में कुछ......या आजतक प़ॉव जमीन पर नहीं पडते मेरे ...। वैसे गुलजार ने रेखा की अदाकारी को देख कर यही कहा.कि....वह उस किरदार को लिबास की तरह पहन लेती है । शायद इसलिये मुज्जफरअली ने उमराव-जान बनने के बाद रेखा की जिन्दगी से गीत जुडा है तो किसी ने ना नहीं कहा....... , जुस्त-जु जिसकी थी उसको ना पाया हमने/इस तरह से मगर देख ली दुनिया हमने.....तो यासर उस्मान की किताब पढते पढ़ते खत्म हो जाये तो भी ये कुलबुलाहट तो बची ही रहती है कि रेखा क्या कभी खुद के बारे में खुलकर कुछ कह पायेगी...या फिर रेखा की नकही कहानी के नाम पर ऐसी किताब ही छपेगी ।

साभार : पुण्य प्रसून बाजपेयी 

Sunday, September 11, 2016

इतिहास से छेड़छाड़ : कहां है लक्ष्मणरेखा

ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ करने में फिल्मों और धारावाहिकों में होड़ लगी हुई है। निगरानी करने वाली संस्थाएं भी खामोश तमाशाई बनी रहती हैं। मनोरंजन के नाम पर इतिहास या किसी किताब के साथ कितनी तोड़मरोड़ की जा सकती है ? इसका समाज के ऊपर कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है ? इन सवालों की पड़ताल कर रहे हैं सुधांशु गुप्त।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (जिसे व्यंग्य में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है)जितनी मशक्कत राजनीतिक फिल्मों में कट लगाने के लिए करता है, उसका दस फीसद भी अगर ऐतिहासिक फिल्मों के साथ होने वाली छेड़छाड़ को रोकने के लिए करता तो आज हमारा समाज अपने इतिहास के प्रति थोड़ा बहुत जागरूक अवश्य हो गया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भारतीय इतिहास के तमाम तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर उसे विकृत किया जाता रहा है। 1941 में सोहराब मोदी ने पृथ्वीराज कपूर को लेकर ‘सिकंदर’ बनाई, उसमें भी इतिहास के साथ कई जगह तोड़फोड़ की गई। लेकिन, उसमें फिर भी गनीमत थी कि ज्यादा घालमेल नहीं हुअी। 1960 में के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ बनाई। सलीम (जहांगीर) और अनारकली के प्रेम संबंधों पर बनी इस फिल्म ने सफलता का सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। हकीकत में इतिहास में अनारकली नाम की कोई महिला थी ही नहीं। यह निर्माता-निर्देशक की कोरी कल्पना थी। और इस कल्पना का लिए जमीन तैयार की थी उनका द्वारा देखे गए एक नाटक ने। फिल्म में इतिहास के साथ खासी छेड़छाड़ की गई, उसे तोड़ा मरोड़ा गया था। मगर फिल्म हिट साबित हुई। इस फिल्म की सफलता ने फिल्म निमार्ताओं के लिए इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए जैसे सारे दरवाजे ही खोल दिए। तब से यह सिलसिला बराबर चल रहा है।
विषयों का लिए दर-दर भटकते फिल्मकारों को अपनी कहानियों के लिए इतिहास का इलाका खासा हराभरा नजर आया। यहां उन्हें प्रेम कहानियां भी मिलीं और भरपूर ड्रामा भी। कुचक्रों और षड्यंत्रों की कथाएं, देशप्रेमी नायक। सब कुछ इतिहास में मिलने लगा। फिल्मकारों ने पौराणिक कथाओं को भी इतिहास में शामिल करके नया मसाला तैयार किया। जो थोड़ी बहुत कमी रह गई थी, उसे फिल्मकारों ने अपनी कल्पनाशीलता के इस्तेमाल से पूरी कर ली। बिना इस बात की परवाह किए कि वे इतिहास को मनोरंजन की सामग्री बना दे रहे हैं। ‘मुगल-ए-आजम’ के बाद 1966 में सुनील दत्त और वैजयंतीमाला की ‘आम्रपाली’, शाहरुख खान और करीना कपूर की ‘अशोका’, आमिर खान की ‘मंगल पांडे’, ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय की ‘जोधा अकबर’ आदि ऐसी ही फिल्में हैं जिन्होंने इतिहास को अपने-अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। तर्क वही था कि फिल्म एक अलग माध्यम है, इसमें आवश्यक बदलाव किया जाना जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के नाम पर फिल्म में मनोरंजक तत्त्व डाले गए। धीरे-धीरे फिल्म निर्माताओं को यह बात समझ में आ गई कि इतिहास के साथ जितनी मर्जी छेड़ छाड़ कर ली जाए कोई कुछ नहीं बोलेगा। और इतिहास ही है जो फिल्मकारों की कहानी की मांग को बेहतर ढंग से पूरा कर रहा है।
इस बीच सिनेमा और दर्शकों का बीच टेलीविजन नामक एक बड़ा माध्यम सामने आ गया। इतिहास और पौराणिक ग्रंथ छोटे परदे का लिए भी मुफीद हो गए। रामायण और महाभारत से लेकर हर हर महादेव, श्रीकृष्ण, सूर्यपूत्र कर्ण, द्रौपदी और हनुमान जैसे लगभग हर किरदारों पर अलग से धारावाहिकों का निर्माण हुआ। इस तरह के धारावाहिकों की सफलता ने धारावाहिक निमार्ताओं को मानो सफलता का सूत्र दे दिया। इन निमार्ताओं ने एक तरफ समाज को मिथ की घुट्टी पिलानी शुरू की और दूसरी तरफ तथ्यों को अपने हिसाब से लिखना शुरू कर दिया। जाहिर है समाज और दर्शकों की तथाकथित समझ रखने वाले इन निमार्ताओं को यह मालूम था कि इतिहास से जुड़े विषय उनके लिए सोने की खान साबित हो सकते हैं। लंबे समय तक ‘सास-बहू’ के धारावाहिकों से बुद्धू बक्सा पर लोगों को बुद्धू बनाने वाली एकता कपूर 2013 में ‘जोधा -अकबर’ धारावाहिक लेकर आईं। इस धारावाहिक को राजस्थान के राजपूत समाज का काफी विरोध सहना पड़ा।
अनेक इतिहासकारों और वकीलों ने यह आरोप लगाया कि जोधा-अकबर राजस्थानी समाज के ताने-बाने को ध्वस्त कर देगा क्योंकि इस धारावाहिक में भयंकर गलतियां हैं और निमार्ताओं ने धारावाहिक बनाने से पहले कोई शोध नहीं किया है। जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलपति एलएस राठौर ने उस वक्त कहा था, ‘व्यावसायिक हितों के लिए इतिहास को तोड़ने मरोड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इतिहास भविष्य की पीढ़ियों की विरासत है। यह भी तथ्य है कि अबुल फजल के ‘अकबरनामा’ में जोधा बाई का कोई जिक्र नहीं है। ‘जहांगीरनामा’ में भी जोधाबाई का कोई उल्लेख नहीं है। धारावाहिक में जोधा बाई को अकबर की पत्नी बताया गया है। अन्य घटनाओं के साथ भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छूट ली गई है, लेकिन इस धारावाहिक के विरोध का कोई असर नहीं हुआ। धारावाहिक बना, चला और पसंद किया गया।
जोधा-अकबर के अलावा ‘महाराणा प्रताप’, ‘झांसी की रानी’ पर धारावाहिक बने और खूब पसंद किए गए। ‘चक्रवर्ती अशोक सम्राट’ की टीआरपी तो शीर्ष पांच धारावाहिकों में रही है। रात का भोजन का समय धारावाहिक देखते समय अनेक सवाल मन में उठते हैं। भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक को एक महान शासक माना गया है। अशोक ने पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। कलिंग युद्ध को भी इतिहास का सबसे खूनी संघर्ष माना गया है। जाहिर है सम्राट अशोक इतिहास रोचक किरदार है जिसके बारे में समाज भी जानना चाहता है। लेकिन धारावाहिक में जिस ढंग से इतिहास का मजाक उड़ाया गया है वह शर्मनाक है। धारावाहिक में की जा रही कुछ तथ्यात्मक गलतियों को कोई भी सामान्य जानकार रेखांकित कर सकता है। मसलन इतिहास में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि अशोक का चाणक्य से कोई संपर्क था या चाणक्य, अशोक को गद्दी पर बिठाना चाहता था। अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व हुआ और चाणक्य की मृत्यु 283ईसा पूर्व में हुई। यानी यह हो सकता है कि चाणक्य अशोक की बाल्यावस्था में उनसे मिले हों, लेकिन जिस तरह धारावाहिक में चाणक्य को लगातार (अनेक कड़ियों में ) अशोक को बढ़ावा देते दिखाया गया है, वह सरासर गलत है। इतिहास इस बात की ओर कोई इशारा नहीं करता कि अशोक को सम्राट बनाने में चाणक्य की कोई भूमिका थी। धारावाहिक में जिस तरह बिंदुसार को एक मूर्ख और जड़ राजा दिखाया गया है, वह इतिहास से एकदम उलट है।
धारावाहिक में बिंदुसार का किरदार इस तरह का है कि उसके राजमहल में चारों तरफ षड्यंत्र चलते रहते हैं लेकिन उसे किसी बात की भनक नहीं मिलती। इतिहास बताता है कि बिंदुसार एक मजबूत और बुद्धिमान राजा था। ठीक उसका उलट, जैसा धारावाहिक में दिखाया गया है। इसी तरह धारावाहिक में और भी कई स्थानों पर ऐतिहासिक तथ्यों के सा खिलवाड़ किया गया है। बिंदुसार की सोलह रानियां थीं न कि चार, जैसा धारावाहिक में दिखाया गया है। बिंदुसार जानता था कि अशोक उसका पुत्र है जबकि धारावाहिक में ऐसा नहीं दिखाया गया। इसी तरह धारावाहिक में दिखाई गई नूर खुरासन जस्टिन की प्रेम कहानी का इतिहास से कोई लेना देना नहीं है। ऐसी ही अनेक तथ्यात्मक गलतियां धारावाहिक में मौजूद हैं। और इन सबसे बचने का जो तरीका निर्माताओं ने खोजा है, वह भी काफी दिलचस्प है। परदे पर नीचे एक पट्टी चलता रहती है जिस पर लिखा रहता है कि इस धारावाहिक का इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है, इसमें सिर्फ कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का नाट्यांतरण किया गया है। यानी आपको इतिहास से खिलवाड़ करने की छूट हासिल हो गई है।
सवाल वही उठता है कि आखिर क्यों हमारे फिल्मकार और धारावाहिक निर्माता हमारे इतिहास के साथ इतनी आजादी ले पाते हैं कि वे उसे जैसा और जहां चाहें मोड़ सकते हैं? क्यों हमारा समाज इसका विरोध नहीं करता? जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में शिक्षक राकेश बटब्याल कहते हैं कि सिनेमा मनोरंजन का साधन है लेकिन जब भी इतिहास और सिनेमा को एक साथ जोड़ा जाएगा तब इस बात की संभावनाएं बनी रहेंगी कि इतिहास के साथ खिलवाड़ हो। आज तो पौराणिक ग्रंथों और इतिहास पर धारावाहिक बनाने की होड़ सी लगी हुई है। इसकी बड़ी वजह यही है कि इनमें नाटकीयता भरपूर होती है। और क्योंकि हमारा समाज इतिहास के साथ हर तरह के खिलवाड़ को स्वीकार कर लेता है, इसलिए निर्माताओं को इसमें कोई दिक्कत नहीं आती। बटब्याल आगे कहते हैं कि हॉलीवुड में भी अनेक ऐतिहासिक विषयों पर फिल्में बनती हैं, पर उन फिल्मों में इतिहास के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं होती, क्योंकि वहां का समाज भारतीय समाज का मुकाबले ज्यादा पढ़ा लिखा है, वह अपने इतिहास को भी समझता है। लेकिन भारतीय समाज अपने इतिहास को भी टीवी या फिल्मों के जरिए ही समझने की कोशिश करता है। यही वजह है कि फिल्म और धारावाहिक निर्माता ऐतिहासिक विषयों को तोड़ मरोड़ पाते हैं। ये लोग किसी भी पौराणिक चरित्र को ऐतिहासिक बना देते हैं…पटेल को कुर्मी बनाकर चित्रित कर देते हैं। वास्तव में टीवी आज समाज को मिथ की घुट्टी पिला रहा है।
लेकिन इस तरह का धारावाहिक देखकर युवाओं की क्या समझ बनेगी? बकौल बटब्याल, ‘ देखिए, टेलीविजन एक बहुत बड़ा माध्यम है, समाज का बहुत बड़ा हिस्सा सीधे टीवी से जुड़ा है। ऐसे में निर्माताओं की यह और भी जिम्मेदारी हो जाती है कि वे इतिहास के साथ न्याय करें। अन्यथा आप सोचिए कि टीवी के जरिए हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जिसे अपने इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं है और अगर जानकारी है भी तो वह गलत और विरूपित जानकारी है। मुझे लगता है कि आज मीडिया और समाज दोनों को इस दिशा में साक्षर बनाए जाने की जरूरत है।’
जाहिर है धारावाहिकों के प्रचार-प्रसार में लगा मीडिया कभी उन धारावाहिकों में इतिहास के साथ छेड़छाड़ का उल्लेख नहीं करता। कभी समाज को यह बताने की कोशिश नहीं करता कि ऐतिहासिक तथ्य ये हैं और धारावाहिकों में इन्हें गलत तरीका से पेश किया जा रहा है। यानी समाज के किसी भी हिस्से से धारावाहिकों में इतिहास के साथ खिलवाड़ का विरोध नहीं दिखाई पड़ता।
जेएनयू में ही सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज की शिक्षक महालक्ष्मी रामाकृष्णन ऐतिहासिक फिल्मों और धारावाहिकों में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ होने वाले खिलवाड़ को अपमानजनक मानती हैं। वह कहती हैं कि निर्माता-निर्देशक आम जनता के लिए नया इतिहास लिख रहे हैं, ऐसा इतिहास, जिसका मूल इतिहास से कोई लेना देना नहीं है। ‘उत्सव’ जैसी फिल्मों में कुछ हद तक उस समय को सही ढंग से चित्रित करने की कोशिश की गई थी। इसी तरह, श्याम बेनेगल ने ‘भारत एक खोज’ में इतिहास को सही ढंग से चित्रित करने की कुछ हद तक कोशिश की थी। लेकिन अब तो चीजें एकदम बदल गई हैं। अब व्यावसायिक सोच निर्माताओं को किसी भी हद तक ले जा सकती है और ले जा रही हैं। उन्होंने बताया, ‘फिल्मों और धारावाहिकों में तारीखें, घटनाएं, परिधान, भाषा और नजरिया- ये सब दिक्कत पैदा कर रहे हैं।
अभी मैंने सोमनाथ पर एक धारावाहिक देखा, इसमें चीजों को इस सांप्रदायिक तरीका से दिखाया गया था कि कोई भी समझदार और पढ़ा-लिखा इंसान चकित रह जाए। पूर्व वैदिक समय में राष्ट्र अलग अर्थों में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन फिल्मों और धारावाहिकों में उसे वर्तमान राष्ट्र का संदर्भ में दिखाया जाता है, जो निहायत गलत है। और इतिहास को गलत दिखाए जाने का सिलसिला केवल हिंदी में ही नहीं है। अभी मैंने तमिल में बारहवीं शताब्दी के एक संत रामानुजन पर एक धारावाहिक देखा। उसमें भी वैचारिक स्तर पर अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ दिखाई दी। यानी जिसे जैसा उचित और फायदेमंद (लोकप्रियता का) लग रहा है वह वैसा ही चित्रण कर रहा है।
हाल ही में आशुतोष गोवारिकर की आने वाली फिल्म मोहनजोदड़ो (सही नाम मुअनजोदड़ो) का ट्रेलर रिलीज हुआ है। इस ट्रेलर से पता चलता है कि यह 2016 ईसा पूर्व के समय को दिखाती है। लेकिन महालक्ष्मी इस फिल्म के ट्रेलर को देखकर बहुत निराश हुर्इं। वह कहती हैं, ‘गोवारिकर वैदिक युग और सिंधु घाटी सभ्यता में ही भ्रमित हैं। फिल्म के ट्रेलर से ही पता चल जाता है कि हम इस फिल्म में एक बार फिर से इतिहास और तथ्यों से छेड़छाड़ देखेंगे। ट्रेलर में अरबी घोड़े दिखाए गए हैं, जबकि यह तथ्य अब सब स्वीकार हो चुका है कि आर्यों के समय घोड़े आए। इसी तरह, फिल्म की नायिका पूजा हेगड़े का जो परिधान है, वैसी वेशभूषा उस सभ्यता में नहीं थी।’ महालक्ष्मी की शिकायत है कि निर्माता-निर्देशक किसी तरह का शोध नहीं करना चाहते। फिल्म में केवल पुरातात्त्विक शोधों के आधार पर बहुत सी गलतियों को सुधारा जा सकता था। आभूषण, मूर्तियां, परिधान, उस सभ्यता में इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तन और उस दौर में व्यापार के तरीकों के जरिए चीजों को बहुत बेहतर किया जा सकता था। लेकिन इतनी मेहनत कौन करे और क्यों करे?
दरअसल, यह संवेदनहीनता पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में लिए है। न तो धारावाहिक और फिल्में बनाने वालों को इससे कोई फर्क पड़ता है और न ही इसे देखने वालों को । हमारा समाज भी इस तरह की चीजों पर किसी तरह का विरोध प्रकट नहीं करता। क्यों हमारा समाज ऐसा बन गया है, उसकी वजह शायद स्कूलों में पढ़ाई गई किताबें हैं। महालक्ष्मी के मुताबिक प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर जो किताबें पढ़ाई जाती हैं, इन किताबों से इंसान की जानने और विरोध करने की ताकत खत्म हो जाती है। मेरा मानना है कि लोगों को जागरूक करने के लिए कुछ संवेदनशील किताबें लिखे जाने की भी जरूरत है ताकि लोगों के भीतर इतिहासबोध पैदा हो और वे अपने इतिहास के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ खड़े हो सकें।
सचमुच आज इस बात की जरूरत है कि इतिहास को लेकर समाज में जागरूकता पैदा हो और इस काम में मीडिया की भी अहम भूमिका हो सकती है। अन्यथा फिल्म और धारावाहिक निर्माता लगातार हमारे इतिहास के साथ खेलते रहेंगे और उसका दोहन करते रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे हाल ही में बिहार में सम्राट अशोक पर एक संग्रहालय बनाया गया। इसमें तमाम चीजों के साथ-साथ एक वीडियो गेम भी है। इस वीडियो गेम में सम्राट अशोक की जगह आप खुद को महसूस कर सकते हैं और जब आप यह गेम जीतते हैं तो आपके भीतर सम्राट अशोक होने का अहसास होता है और आप खुद को विजेता समझने लगते हैं।
टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में भी सारा अर्थशास्त्र इसी बात पर टिका है कि वह कार्यक्रम की टीआरपी क्या लाता है और फिल्म बॉक्स आॅफिस पर कितना पैसा कमाती है। मजेदार बात है कि वीडियो गेम में तो आप विजेता बनते हैं (चाहे आभासी ही सही) लेकिन इस खेल में विजेता केवल निर्माता ही होता है। और वह भी जनता को धोखा देकर, उसके सामने गलत-सलत इतिहास परोसकर, इतिहास के साथ खिलवाड़ कर। और जनता चुप रहती है। आखिर कब तक जनता चुप रहेगी और कब तक अपने इतिहास को बचाने के लिए आगे नहीं आएगी?